यूरोपीय संघ ने प्रतिलिप्यधिकार दिशानिर्देश को दी मंजूरी

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यूरोपीय संसद ने उस दिशानिर्देश को मंजूरी दे दी है जिससे यूरोपीय अंतर्जाल (तकिंदी: इंटरनेट) व्यवस्था में अफरातफरी की हालत बन सकती है। यह दिशानिर्देश यूरोप की वर्तमान प्रतिलिप्यधिकार कानून में नयी अध्याय जोड़ती है।

इसे लेकर अंतर्जाल पर काफी गहमागहमी हो चुकी है और इसकी सबसे ज्यादा विवादित धारा है: अनुच्छेद 13 जो अपलोड फिल्टर के नाम से भी ज्ञात है। जब यह दिशानिर्देश यूरोप की सदस्य देशों से पारित हो जायेगी, तब यह 24 महीनों के भीतर राष्ट्रीय कानून बन जायेगी।

गौरतलब है कि यह प्रतिलिप्यधिकार दिशानिर्देश (आँग्ल: कोपीराइट डाइरेक्टिव) पिछले दो वर्षों से लागू है और इसके निशाने पर प्रौद्योगिकी दिग्गज कंपनियाँ हैं जो नहीं चाहती हैं कि यह कानून अस्तित्व में आये।

यह कानून किस तरह साकार होगी, कहना मुश्किल है पर यूरोप और इसके आसपास के देशों में अंतर्जाल जिस तरह काम करती है, उसपर काफी प्रभाव पड़ने वाली है। हमलोग जीडीपीआर के मामले में देख चुके हैं कि शीर्ष प्रौद्योगिकी कंपनियाँ किस तरह छटपटाते हुये अपने नियम-कानूनों में तब्दीलियाँ कर रही थी।

इस कानून के पारित होने के बाद यूरोपीय नागरिक अंतर्जाल पर कोपीराइटेड सामग्री पोस्ट नहीं कर पायेंगे और अगर किसी अंतर्जाल कंपनी के मंच पर ऐसी कोई कोपीराइटेड सामग्री मिलती है, तो उस कंपनी को कानूनी तौर पर अंजाम भुगतना पड़ेगा।

दिशानिर्देश के समर्थकों का कहना है कि इस कानून की वजह से यूरोपीय सामग्री रचनाकारों (आँग्ल: कंटेंट क्रियेटर) की कोपीराइट अधिकार सुरक्षित रहेगी और इन रचनाकारों के पास शक्ति होगी जिससे वे विभिन्न अंतर्जाल मंचों पर अपनी वितरित सामग्रियों (आँग्ल: कंटेंट) को नियंत्रित कर पायेंगे।

हालाँकि, ऐसा कोई कानून इस सदी में आपकी मदद नहीं कर सकता जो लोकतांत्रिक रूप से काम करती है। यहाँ हर कानून का तोड़ मौजूद है। आप कुछभी कर लीजिये पर अंतर्जाल पर सामग्री नियंत्रण, और वह भी जबर्दस्ती, रखने से आप सामग्री रचनाकारों की सामग्री को लोगों तक पहुँचने से ही रोकेंगे जिससे इनका प्रसार ही घटेगा।

इस कानून की अनुच्छेद 11 प्रकाशकों को अनुमति देती है कि जब गूगल न्यूज उनकी खबरों को बतौर स्निपेट दिखायेगी, तब वे गूगल से स्निपेट दिखाने के बदले शुल्क ले सकेंगे जबकि अनुच्छेद 17 यूट्यूब जैसी अपलोडिंग वेबसाइटों को आदेश देती है कि वे अपने उपयोक्ताओं को कोपीराइटेड सामग्री अपलोड करने से रोकेंगे।

इस स्निपेट शुल्क की वजह से गूगल आसानी से बच जायेगी लेकिन प्रकाशकों का हाजमा भी बिगड़ेगा जिनके पृष्ठ दृश्य (आँग्ल: पेज व्यू) गूगल की मेहरबानी से चाँद-सितारों की सैर करते हैं। जो प्रकाशक गूगल पर लिंक चार्ज लगायेंगे, गूगल अपनी स्निपेट में उनकी पोस्ट नहीं दिखायेगी अन्यथा वह गूगल न्यूज को बंद करके इस लिंक चार्ज से पूर्णतया बच जायेगी।

यह लिंक टैक्स 2013 में जर्मनी एवं स्पेन में लागू की गयी थी पर यह व्यवस्था ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पायी। इस कानून के समर्थक मानते हैं कि गूगल उनके देश में अनियमित गतिविधियाँ करती हैं जिनकी वजह से वह अपने स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों से कई गुना आगे पहुँच जाती है।

अंतर्जाल पर मौजूद कई यूरोपीयों का मानना है कि इससे उनका अंतर्जाल अनुभव काफी प्रभावित होगी और इससे उनके बाजार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालाँकि इस कानून को अभी 24 महीने का लंबा सफर तय करना है जब उसे सदस्य देशों की संसद से पारित होना पड़ेगा और तब जाकर यह एक पूर्ण कानून का दर्जा ले पायेगी।

छवि स्त्रोत: pexels

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