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ब्रिटेन ने आईएसआईएस का प्रचार करने वाली सजालों को पहचानने हेतु अल्गोरिदम बनाया

ब्रिटिश सरकार ने एक मशीन लर्निंग अल्गोरिदम (कलनिधि) की रचना को आर्थिक तौर पर मदद दी है जिसके उपयोग से अब आईएसआईएस की ओनलाइन प्रचार करने वाली वेबसाइटों (सजालों) को तुरंत पहचाना जा सकेगा।

स्त्रोत: pexels.com

ब्रिटिश सरकार का यह ताजा कदम अंतर्जाल पर चरमपंथी सामग्रियों की बढ़ती संख्या के कारण बढ़ रही सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर है। यह औजार लंदन की स्टार्टप एएसआई डाटा साइंस द्वारा रचित है और इसके विकास पर £600,000 (₹4.77 करोड़) खर्च आयी है।

इस औजार का वितरण छोटी वीडियो मंचों और क्लाउड स्टोरेज (मेघ भंडारण) सजालों जैसे वीमियो और पीक्लाउड को दिया जायेगा ताकि वे ऐसी संवेदनशील व हिंसक सामग्रियों से निपट सके। फेसबुक और यूट्यूब जैसी बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियाँ इस औजार का उपयोग नहीं कर रही हैं। हालाँकि, चरमपंथी सामग्रियों को पहचानने के लिये ये खुद अपनी अल्गोरिदम विकसित कर रही हैं।

एएसआई के अनुसार, यह अल्गोरिदम 94 प्रतिशत आईएसआईएस दुष्प्रचारों को 99.99 प्रतिशत शुद्धता के साथ पहचान सकती है। यह कलनिधि स्कैन किये गये वीडियो में से 0.005 प्रतिशत वीडियो को गलत मानने की त्रुटि करती है। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक दिन किसी सजाल पर उद्भारित (अपलोड) 50 लाख वीडियो पर, यह 250 वीडियो को मानवीय समीक्षा के लिये ध्वज करती है। इसके बाद वीडियो उद्भारक (अपलोडर) उस वीडियो में कोई संशोधन करके उस वीडियो को पुनः जारी करते हैं और तभी वह वीडियो आमजनों के लिये उपलब्ध हो पाती है।

एएसआई अपने निर्णयों को ठोस बताने के लिये उन कारकों की जानकारी सार्वजनिक तौर पर साझा नहीं कर रही है जो उक्त सोफ्टवेर के मजबूत आधार हैं। बीबीसी न्यूज के मुताबिक, यह अल्गोरिदम आईएसआईएस और उसकी ओनलाइन गतिविधियों की विशेषताओं पर आधारित है। इसमें चाक्षुक संकेत जैसे, लोगो (अनुप्रतीक) के साथ मैटाडाटा भी शामिल हो सकते हैं, जैसेकि उक्त वीडियो कहाँ से उद्भारित (अपलोड) की गयी थी।

“इन वीडियो का उद्देश्य हमारे समुदायों में हिंसा फैलाना, उनके संगठन के लिये लोगों को नियुक्त करना और समाज में भय का वातावरण बनाना है”, अंबर रूड, ब्रिटिश गृह सचिव ने कहा।

“हम जानते हैं कि ऐसी स्वचालित प्रौद्योगिकी आतंकियों की मंसूबों को नाकाम कर सकती है और इसके साथ इनकी दर्दनाक तस्वीरों के द्वारा लोगों को होने वाली असहजता से भी बचाया जा सकेगा।”

हालिया दिनों में अमेरिका और ब्रिटेन ने प्रौद्योगिकी कंपनियों को उनके सजालों पर उद्भारित सामग्रियों की निगरानी पर काफी दबाव दिया है। दिसंबर 2017 में यूट्यूब ने कहा था कि उसने डेढ़ लाख से अधिक वीडियो को अपने सजाल से हटा दिया था क्योंकि वे हिंसात्मक चरमवाद का प्रचार रही थी।

इसके साथ ही यूट्यूब ने जोड़ा था कि उसकी अल्गोरिदम ने संदेहास्पद वीडियो में से 98 प्रतिशत संदिग्ध वीडियो को पहचान लिया था। फेसबुक ने इसपर कहा था कि उसकी अपनी प्रणाली आईएसआईएस और अलकायदा संबंधी 99 प्रतिशत सामग्रियों को हटा देती है।

तबभी, विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की अल्गोरिदमिक कुशलताओं से ऐसी सामग्रियों को ढूँढकर हटाना आसान काम नहीं है। इसके बजाय यह चूहा-बिल्ली का खेल बन जाती है जहाँ दुष्प्रचारक काम करने का नया तरीका ढूँढते रहते हैं और फिर प्रौद्योगिकी कंपनियाँ अपने अल्गोरिदम में सुधार करके उन्हें पकड़ते रहेगी।

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